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छठ के पावन पर्व पर रउवा सभे के ढेरों बधाई और शुभकामना

 

 

 

सउँसे भोजपुरिया समाज और छठ के पावन पर्व करे वाला लोगन के छठ के पावन पर्व पर ढेरों सारा बधाई और शुभकामना माई हर मनोकामना पूर्ण करस घर में सुख और शांति देस

जय हो सुरुज देवा, जय हो छठी माई

 

Tags: के, छठ, पर्व, पावन

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हमरो ओरी से सभे भाई बहिन के गोधन भाई दूज पीडिया छठ के पावन पर्व के बधाई औरू शुभकामना बा !
इहे पर्व सभ हमनी के संस्कृति औरू पहचान बा !
जय भोजपुरी जीय भोजपुरी !

जय हो छठी माई की जय हमरो तरफ से येह पावन पर्व पर सब भाई बहिन के हार्दिक शुभकामना आ बधाई माई सभे पर आपन कृपा बनावले राखस.

 

 

 

मोंटु भाई प्रनाम आ जय भोजपुरी

 

बहुत बेजोड बा दुनो के दुनो ग्रिटींग ,,,, गरदा बा :-)

 

छठ माई के आसिरबाद सबका प परल रहे आ संगे संगे गोधन , पिडिया आ भईया दुज के भी बधाई सब केहु के !

 

जय हो छठ मईया , जय हो सुरुज देवता !

 

जय भोजपुरी

कल नहाय-खाय के साथ प्रारंभ हो जाएगा महापर्व छठ

 

पटना। बिहार का प्रमुख लोकपर्व छठ इस वर्ष रविवार को व्रतियों के 'नहाय-खाय' के साथ प्रारंभ होगा। छठ के अवसर पर व्रत रखने वाली महिलाएं जहां महापर्व की तैयारियों में जुट गई हैं वहीं छठ बाजार भी सजने लगे हैं। बाजार में सूप, दउरा, आम की लकड़ी, चूल्हा और फलों की दुकानें सज चुकी हैं।

 

पंडित महादेव मिश्र के मुताबिक छठ पर्व का शुभारंभ 30 अक्टूबर रविवार को 'नहाय-खाय' के साथ प्रारंभ होगा। व्रत रखने वाली महिलाएं इस दिन स्नान कर अरवा चावल, चना दाल और कद्दू की सब्जी खाएंगी। इस दिन खाने में सेंधा नमक का ही प्रयोग किया जाता है। दूसरे दिन सोमवार को कार्तिक शुक्ल पक्ष पंचमी के मौके पर दिनभर व्रत रखने वाली महिलाएं उपवास कर शाम को विधि विधान से रोटी तथा गुड़ से बनी खीर का प्रसाद तैयार करेंगी और फिर सूर्य भगवान का स्मरण कर प्रसाद ग्रहण करेंगी। इस पूजा को 'खरना' कहा जाता है।

इसके अगले दिन मंगलवार को उपवास रखकर शाम को व्रत रखने वाली महिलाएं नदी, तालाबों या अन्य जलाशयों में जाकर अस्ताचलगामी सूर्य को अ‌र्ध्य अर्पित करेंगी और फिर बुधवार को उदीयमान सूर्य को दूसरा अ‌र्ध्य अर्पित कर वापस लौटकर अपना व्रत तोड़ेंगी।

इस बीच पटना सहित राज्य के विभिन्न हिस्सों में छठ घाटों की साफ-सफाई का कार्य जोर-शोर से चल रहा है। व्रत रखने वाली महिलाओं को किसी प्रकार की परेशानी ना हो इसका पूरा ख्याल रखा जा रहा है। बाजार में भीड़ है तथा लोग आवश्यक सामग्री खरीद रहे हैं। औरंगाबाद जिले के देव में स्थित सूर्य मंदिर में सूर्योपासना के लिए हजारों की भीड़ अभी से एकत्र होने लगी है। व्रत रखने वाली महिलाएं अपनी मनोकामना पूर्ण होने के बाद यहां सूर्य भगवान को अ‌र्ध्य अर्पित करती हैं। पटना में गंगा किनारे घाटों पर भीड़ को देखते हुए प्रशासन सुरक्षा के पुख्ता प्रबंध करने में जुटा है। सभी घाटों पर सशस्त्र बल तैनात करने तथा संबंधित थाना प्रभारियों को गश्त करने का आदेश दिया गया है। पटना के जिलाधिकारी संजय कुमार सिंह के मुताबिक किसी भी स्थिति से निपटने के लिए सभी घाटों पर गोताखोर के साथ नावों और महाजाल की व्यवस्था करने का निर्देश दिया गया है।

 

जागरण

सब लोग के प्रणाम आ पावन पर्व छठ के हार्दिक शुभकामना,
छठ मइया सबकर भला करें कल्याण करें .... जय हो छठ माई ..जय भोजपुरी ।

montu bhai ji parnam a jai bhojpuri |

raua ke bhi bahut bahut badhai a shubhkamna |

chhath mai savnse bhojpuria par apan kirpa banavale rakhas|

jai bhojpuri 

jai chhath mai   jai suruj dev ji 

 

sanjay pandey 

छठ पुजा ना कवनो जाति विशेस के पुजा ह ना कवनो धर्म आ छेत्र विशेस के पुजा ह , छठ पुजा त इंसानियत के संगम ह , गांव जवार शहर कस्बा के लोग अपना छत प हउदा बना के त घाट घाट प पोखरा के आरी कगरी , नदी तलाब के जरी से ले के हिन्द महासागर मे ले एह पुजा खाति जुटेला सांच पुछी त इंसानियत के संगम ह छठ पुजा ! आ पुजा होला उनुकर जिनका रोसनी से संवसे बिश्व मे अंजोर भईल रहेला !

 

 

जय हो छठ मईया , जय हो अदितमल ....

लोक आस्था का पर्व सूर्य षष्ठी यानी छठ पर्व कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की चतुर्थी से षष्ठी तिथि के बीच मनाया जाता है। इस बार यह तिथि आ रही है 30 अक्टूबर से 1 नवम्बर के बीच। हमारे देश में सूर्य उपासना के कई प्रसिद्ध लोकपर्व हैं जो अलग-अलग प्रांतों में अलग-अलग रीति-रिवाजों के साथ मनाए जाते हैं। सूर्य षष्ठी के महत्व को देखते हुए इस पर्व को सूर्यछठ या डाला छठ के नाम से संबोधित किया जाता है। इस पर्व को बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और नेपाल की तराई समेत देश के उन तमाम महानगरों में मनाया जाता है, जहां-जहां इन प्रांतों के लोग निवास करते हैं। यही नहीं, मॉरिशस, त्रिनिडाड, सुमात्रा, जावा समेत कई अन्य विदेशी द्वीपों में भी भारतीय मूल के प्रवासी छठ पर्व को बड़ी आस्था और धूमधाम से मनाते हैं। डूबते सूर्य की विशेष पूजा ही छठ का पर्व है! चढ़ते सूरज को सभी प्रणाम करते हैं।

 

छठ पर्व की परंपरा में बहुत ही वैज्ञानिक और ज्योतिषीय महत्व भी छिपा हुआ है। षष्ठी तिथि एक विशेष खगोलीय अवसर है, जिस समय धरती के दक्षिणी गोलार्ध में सूर्य रहता है और दक्षिणायन के सूर्य की अल्ट्रावॉइलट किरणें धरती पर सामान्य से अधिक मात्रा में एकत्रित हो जाती हैं क्योकि इस दौरान सूर्य अपनी नीच राशि तुला में होता है। इन दूषित किरणों का सीधा प्रभाव जनसाधारण की आंखों, पेट, स्किन आदि पर पड़ता है। इस पर्व के पालन से सूर्य प्रकाश की इन पराबैंगनी किरणों से जनसाधारण को हानि न पहुंचे, इस अभिप्राय से सूर्य पूजा का गूढ़ रहस्य छिपा हुआ है। इसके साथ ही घर-परिवार की सुख- समृद्धि और आरोग्यता से भी छठ पूजा का व्रत जुड़ा हुआ है। इस व्रत का मुख्य उद्देश्य पति, पत्नी, पुत्र, पौत्र सहित सभी परिजनों के लिए मंगल कामना से भी जुड़ा हुआ है। सुहागिन स्त्रियां अपने लोक गीतों में छठ मैया से अपने ललना और लल्ला की खैरियत की ख्वाहिश जाहिर करती हैं।

 

छठ पर्व की सांस्कृतिक परंपरा में चार दिन का व्रत रखा जाता है। यह व्रत भैया दूज के तीसरे दिन यानि शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि से आरंभ हो जाते है। व्रत के पहले दिन को नहा-खा कहते हैं। जिसका शाब्दिक अर्थ है स्नान के बाद खाना। इस दिन पवित्र नदी गंगा में श्रद्धालु स्नान करते हैं। वैसे तो यह पर्व मूल रूप से गृहिणियों द्वारा मनाया जाता है, लेकिन आजकल पुरुष भी इसमें समान रूप से सहयोग देते हैं।

 

पहले दिन के व्रत में गंगा नदी अथवा जो भी पवित्र नदी गांव या घर के आस-पास बह रही हो, वहां पर स्नान के बाद जल को घर में लाया जाता है और उस पवित्र जल से सारे घर को शुद्ध किया जाता है। इस व्रत में सायंकाल ही कद्दू की सब्जी के साथ शुद्ध भोजन ग्रहण करना पड़ता है।

 

दूसरा दिन खरना कहलाता है, जो पंचमी के दिन पड़ता है। इस दिन भी घर की महिलाएं और पुरुष पूरे दिन उपवास रखते हैं और सांयकाल सूर्यास्त के बाद ही प्रसाद ग्रहण करते हैं। इस दिन का मुख्य प्रसाद चावल की खीर होती है। पूरी, हलवा आदि भी केले की सब्जी के साथ खाए जाते है। इस दिन का प्रसाद परिवार में इष्ट मित्रों के साथ मिलकर ग्रहण किया जाता है। इसके उपरांत अगले 36 घंटों तक निर्जल रहना पड़ता है।

 

तीसरे दिन छठ पूजा होती हैं। जब सायंकाल के समय डूबते सूरज को चलते पानी में अर्घ्य दिया जाताहै। इस पूजा के दौरान व्रती महिलाएं और पुरुष कार्निवल की तरह अपने आशियानों से निकलते हैं। सिर में पूजा की सामग्री, दीपक, गन्ना और धूप-अगरबत्ती सहित फूल-फल आदि एक टोकरी में लेकर छठ मैया के गीत गाते हुए पूजा के घाटों पर पहुंचती हैं। वहां पर पंडित और पुरोहित द्वारा संकल्प को मंत्रोच्चार के बाद सूर्य भगवान को विदाई के वक्त अर्घ्य दिया जाता है। डूबते सूरज को पूजने से ही श्रद्धालुओं की मान्यता है कि उनके सारे कष्ट दूर हो गए। इस दिन गन्ने का प्रसाद बांटना विशेष पुण्यदायक होता है, साथ ही घर में आकर धूप दीप और दीवाली की तरह रोशनी करके पूरी रात उपवास करते हुए भक्ति संगीत और गाना-बजाना होता है।

 

चौथे दिन को परना यानी विहान अर्घ्य कहते हैं। इस दिन प्रातः काल उगते सूरज को अर्घ्य देने के लिए पुनः नदी तट पर एकत्रित होते हैं। आज के दिन अंतिम पूजा की रस्म निभाई जाती है। सूर्य भगवान को अर्घ्य देने के बाद लोग अपने परिजनों और इष्ट मित्रों से मिलते हैं और एक दूसरे को प्रसाद देते है। नदी तट पर पूरा बाजार लगा होता है।

 

छठ का पौराणिक महत्व अनादिकाल से बना हुआ है। रामायण काल में सीता ने गंगा तट पर छठ पूजा की थी। महाभारत काल में कुंती ने भी सरस्वती नदी के तट पर सूर्य पूजा की थी। इसके परिणाम स्वरूप उन्हें पांडवों जैसे विख्यात पुत्रों का सुख मिला था। इसके उपरांत द्रौपदी ने भी हस्तिनापुर से निकलकर गडगंगा में छठ पूजा की थी। छठ पूजा का संबंध हठयोग से भी है। जिसमें बिना भोजन ग्रहण किए हुए लगातार पानी में खड़ा रहना पड़ता है, जिससे शरीर के अशुद्ध जीवाणु परास्त हो जाते हैं।

 

चार दिनों के इस पर्व में आखिरी दो दिन ही ज्यादा चहल-पहल वाले होते हैं। आज के शहरीकरण के कारण लोग अपने मूल प्रांतों से अन्य शहरों में प्रवास करने लगे हैं। छठ पूजा पर अनेक प्रवासी अपने-अपने गांव-घरों को जाने की कोशिश तो करते हैं, लेकिन प्रत्येक परिवार के लिए यह संभव नहीं हो पाता है। इसके अलावा हर बड़े महानगर में बहती नदी का भी अभाव है। जैसे दिल्ली में यमुना किनारे छठ पूजा के समय विशाल जनसमूह एकत्रित होता है। इसी तरह मुंबई, पुणे, बेंगलुरु और चेन्नै में भी लोग छठ पूजा के लिए उत्साहित होकर नदी और तालाबों की खोज करते है। वैसे तो चलते हुए पानी में ही छठ मनाने की परंपरा है, लेकिन लोगों की भीड़ को देखते हुए आज-कल शहरों में छोटी-छोटी बावड़ी और तालाबों में लोग उतर जाते हैं। इससे पूजा की रस्म अदायगी मात्र होती है, बाकी उन इलाकों में कूड़ा-करकट और जल-प्रदूषण बढ़ जाता है। समुद्र और नदी की पवित्रता को बचाए रखने के लिए छठ पूजा के लिए विशेष घाट आदि के बंदोबस्त किए जाते हैं, लेकिन इन सबके बावजूद छठ का त्योहार सबके लिए एक जरूरी पर्व है, जिन्हें अपनी परंपराओं से प्यार है।

 

स्रोत - नभाटा

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