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प्रणाम आ जय भोजपुरी
काल्ह बिहार के पाहिलका मुख्यमंत्री श्रीकृष्णा सिन्हा (श्री बाबू ) के जन्म दिन रहे जिनकारा के बिहार केसरी भी कहल जाला उहा के जीवन के कुच्छ पल पर लेख लिखले बानी श्री सुरेंद्र जी उ हम ईहा पोस्ट करत बानी

।। सुरेंद्र किशोर ।।
बिहार के प्रथम मुख्यमंत्री श्रीकृष्ण सिन्हा (श्रीबाबू) के निधन के बाद उनकी तिजोरी को तीन सदस्यीय समिति की देखरेख में खोला गया था. समिति के सदस्य थे तत्कालीन कार्यवाहक मुख्यमंत्री दीप नारायण सिंह, सवरेदय नेता जयप्रकाश नारायण और राज्य के मुख्य सचिव एसजे मजुमदार. जब उच्चस्तरीय समिति बनी थी तो इसे लेकर सभी हलकों में तरह-तरह की आशंकाएं थीं.
एक ऐसे मुख्यमंत्री के निजी खजाने का प्रश्न था, जो 17 साल तक सत्ता में रहे. याद रहे कि श्रीबाबू के परिजन सरकारी आवास में उनके साथ नहीं रहते थे. तिजोरी खुलते ही श्रीबाबू के विघ्नसंतोषियों को निराशा हुई और उनके प्रशंसकों को खुशी. उस तिजोरी में मात्र 25 हजार रुपये थे और श्रीबाबू का लिखा एक नोट भी था. लिखा था कि इसमें से 22 हजार रुपये कांग्रेस पार्टी को दे दिये जायें, जिसका सदस्य रहने से मुङो प्रतिष्ठा मिली. दो हजार रुपये मेरे राजनीतिक मित्र शाह उजेर मुनीमी के पुत्र को मिले, जो आर्थिक संकट ग्रस्त हैं. बाकी एक हजार महेश प्रसाद सिन्हा की पुत्री की शादी में मेरी तरफ़ से उपहार के रूप में दे दिये जायें.
यह था लंबे समय तक सत्ता में रहे एक स्वतंत्रता सेनानी का निजी खजाना. याद रहे कि उसमें से कोई भी राशि उनके दो पुत्रों में से किसी के लिए नहीं थी. यह कहानी बिहार वाणिज्य मंडल के पूर्व अध्यक्ष 84 वर्षीय युगेश्वर पांडेय ने इन पंक्तियों के लेखक को बतायी. ऐसी कहानी किसी ईमानदार व्यक्ति को भावुक बना देती है. ऐसा नहीं था कि राजनीति और सत्ता को पैसे कमाने का जरिया बनाने वाले लोग श्रीबाबू के जमाने में नहीं थे. हां, ऐसे कम ही लोग थे.
श्रीबाबू के आचरण के विपरीत एक अन्य स्वतंत्रता सेनानी के बैंक खाते में 1967 में करीब छह लाख रुपये पाये गये थे, जबकि सत्ता में आने से पहले 1946 में उनके खाते में मात्र 600 रुपये थे. इसके अलावा उस सज्जन ने बीस साल में बिहार के विभिन्न स्थानों में 12 भूखंड व मकान अर्जित किये थे. आज जब अन्ना हजारे जैसी गैर राजनीतिक हस्ती को इस देश के भ्रष्टाचार के विरोध में आंदोलन करना पड़ रहा है, तो श्रीबाबू जैसे नेता याद आते हैं.
आज श्रीबाबू की जयंती मनायी जा रही है. जयंती मनाने वालों में अधिकतर लोग उनके नाम का दोहन करके राजनीति में कुछ पाना चाहते हैं. हालांकि सब ऐसे नहीं हैं. उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि यही हो सकती है कि उनके निजी चारित्रिक गुणों में से दस प्रतिशत गुण भी अपनाने की कोशिश आज के नेता व कार्यकर्ता करें. क्या आज ऐसी कोशिश कहीं नजर आ रही है? मौजूदा दौर की राजनीति में उनकी चर्चा प्रासंगिक है.
श्रीबाबू जब भी चुनाव लड़ते थे, चुनाव के दौरान अपने चुनाव क्षेत्र में वोट मांगने खुद नहीं जाते थे. फ़िर भी वे जीतते थे. इतना ही नहीं, जब वे 1957 में कांग्रेस विधायक दल के नेता पद का चुनाव लड़ रहे थे, तो उन्होंने खुद अपना मत नहीं डाला. उनके खिलाफ़ उनके मित्र डॉ अनुग्रह नारायण सिंह नेता पद के उम्मीदवार थे. अनुग्रह बाबू उम्मीदवार बनना नहीं चाहते थे. पर उनके कुछ करीबी लोगों ने उन्हें खड़ा कर दिया था. कांटे की टक्कर में खुद उम्मीदवार रहने के बावजूद श्रीबाबू ने कहा कि मैं अपना वोट नहीं डालूंगा. किसके खिलाफ़ मैं वोट डालूं?
समाजवादी नेता पंडित रामनंदन मिश्र ने श्रीबाबू के बारे में लिखा है कि नयी पुस्तक खरीदने और पढ़ने की उनमें अद्भुत चाहत रहती थी. श्रीबाबू अपने वेतन का बड़ा हिस्सा उस पर खर्च कर देते थे. देशरत्न डॉ राजेंद्र प्रसाद और बिहार केसरी श्रीकृष्ण सिन्हा के सादे रहन-सहन की तुलना आज के शासकों से करने पर मुगल राज या रोमन राज्य के उत्थान व पतन की कहानी याद आ जाती है. पंडित मिश्र ने यह बात अस्सी के दशक में लिखी थी. आज के लोकतंत्र के अधिकतर बादशाहों के जीवन तो और भी आलीशान बन चुके हैं. ऐसे में श्रीबाबू जैसे नेताओं की जयंती मनाना तो जरूरी है, पर उससे ज्यादा जरूरी यह है कि मनाने वाले नेता व कार्यकर्तागण मौजूदा भ्रष्टाचार से देश को निकालने की भी कोशिश करें, अन्यथा आनेवाली पीढ़ियां हमें माफ़ नहीं करेंगी.
बिहार केसरी को याद करते हुए पूर्व केंद्रीय मंत्री श्यामनंदन मिश्र ने लिखा था कि श्रीबाबू और अनुग्रह बाबू बिहार की राजनीति में एक-दूसरे के प्रतिद्वंद्वी माने जाते थे. लेकिन दुनिया में ऐसी मिसाल कम ही मिलती है कि ऐसे माने जाने वाले प्रतिद्वंद्वियों में आपस में कभी भी गर्मागर्म बहस नहीं हुई. वे जब मिलते थे, तो एक होकर ही निकलते थे. मतभेद की बात कौन कहे, सौहार्द का ही वातावरण होता था. 1957 में नेता पद के चुनाव में जीतने के बाद अनुग्रह बाबू बधाई देने के लिए श्रीबाबू के यहां आये थे. श्रीबाबू ने अनुग्रह बाबू को पकड़ कर उन्हें जमीन से ऊपर उठा लिया था. मिलन के इस अवसर पर श्रीबाबू और अनुग्रह बाबू की आंखों में आत्मीयता के अविरल आंसू बह रहे थे.
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अनूप जी प्रणाम आ जय भोजपुरी
जी भैया रौआ सही कहनी ईमानदार आ महान ब्यक्ति के जीवनी पढ़ाला पर मन मे ज़रूर कुच्छ ना कुच्छ फ़रक पड़ेला आ अंतरात्मा मे भी बदलाव होला
Permalink Reply by Rajeev Mishra "राजीव भोजपुरिया" on October 24, 2011 at 8:45pm प्रणाम भाई जी
बहुत बढ़िया जानकारी मिलल यह लेख द्वारा अईसने महापुरुष लोग के जीवन गाथा पढ़ला के बाद मन गद गद हो जाला
जय हो
parnam a jai bhojpuri bhai ji
bahut niman samachar dehala |
hamaro taraf koti koti naman ba |
jai bhojpuri
sanjay pandey
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