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आज जय प्रकाश नारायण जी के जन्म दिवस पर हम सब भोजपूरिया भाई लोग के तरफ से ये महान पुरुष के सत् सत् नमन
प्यारे साथियों,
काफी चिन्तन के बाद मैने आपकों यह पत्र लिखने का निश्चय किया है। यह काम मेरे लिए आसान नहीं था। जीवनभर के साथियों से एकदम सम्बन्ध विच्छेद करना कभी आसान नहीं होता। हमने साथ-साथ काम किया है, जेलें काटी है, अज्ञातवास की जोखिमों से गुजरे है और साथ – साथ ही स्वतंत्रता की राख होते देखी है। हम सभी को अभी कुछ यात्रा पूरी करनी बाकी है।
किन्तु जहां तक मेरा सम्बंध है, मैं यह अनुभव करता हूं कि अब मैं यात्रा के एक ऐसे मोड़ पर आ गया हूं, जहां मुझे साथ छोड़कर बाकी का रास्ता अकेले ही तय करने का निश्चय कर लेना चाहिए। यदि आप लोगों को भी अपने साथ चलने के लिए राजी कर सका होता, तो मेरे दिल में बेहद खुशी होती। किन्तु मैं जानता हूं, कम-से-कम अभी तो यह सम्भव नहीं है। फिर भी मुझे विश्वास है, हमारे रास्ते एक हो ही जायेंगे। हम स्वयं भले ही उस दिन को देखने के लिए बाकी न रहें, स्वतंत्रता और बन्धुत्व स्थापित होते हैं, तो समाजवाद को आखिरकार सर्वोदय में विलीन होना ही पड़ेगा।
चार वर्ष पहले बोधगया-सर्वोदय-सम्मेलन के अवसर पर ही मैंने राजनीति छोड़ने का निश्चय कर लिया था। किन्तु प्रजा-समाजवादी दल का सदस्य में बना रहा, यद्यपि किसी-किसी बैठक में शामिल होने तथा कभी-कभी कुछ सलाह दे देने के अतिरिक्त दल के कार्यक्रमों में मैंने भाग नहीं लिया। पिछले आम चुनावों से कुछ पहले मै। इस निष्कर्ष पर पहुचा कि मुझे प्रजा-समाजवादी दल की निष्क्रिय सदस्यता से भी मुक्त हो जाना चाहिए। किन्तु आचार्यजी बीमार थे और उनसे चर्चा किये बिना मै। यह कदम उठाना नहीं चाहता थाा। इस देश और समाजवादी हित के दुभ्ज्र्ञाग्य से आचार्य नरेन्द्रदेव का निधन हो गया। प्रजा-समाजवादी दल के लिए, जो पहले ही फूट के कारण कमजोर हो गया था, यह एक मर्मान्तक धक्का था। प्रमुख साथियों ने मुझसे आग्रह किया कि मैं चुनावों के समाप्त होने तक अपने त्याग-पत्र की घोषणा न करूं। मै। राजी हो गया, किन्तु यह तय था कि जैसे ही चुनाव समाप्त होंगे, मेरे इस्तीफे की घोषणा कर दी जायेगी। इसमें जो देर हुई, उसका एक ही कारण है। मैं चाहता था कि आपके सामने और सामान्यतया पूरे देश के सामने उन सब चीजों को रख दूं, जिनसे प्रेरित होकर मैंने यह सख्त कदम उठाया है। मेरे लिए यह कदम बिल्कुल स्वाभाविक था। सरों को जरूर बहुत सख्त मालूम हो रहा है। प्रायः प्रतिदिन कोई न कोई व्यक्ति मुझसे यह प्रश्न पूछते हैं कि मुझे राजनीति छोड़नी ही क्यों चाहिए थी। लोगों का राजनीति पर कितना विश्वास है, उस पर उन्हें कितना भरोसा है, यह देखकर मुझे दया आती है। किन्तु मुझे अपने इस कार्य का औचित्य प्रत्येक व्यक्ति को अलग-अलग बताना कठिन मालूम होता है। उसी कठिनाई को दूर करने का मै। यहां प्रयास कर रहा हूं।
राजनीति ने लोगों के दिमागों को इस तरह जकड़ रखा है, और फिर इसका विकल्प भ्ी अभी इतनी प्रारम्भिक स्थिति में है कि अपने इस वक्तव्य के द्वारा अधिक पाठकों को राजी करने में शायद ही मुझे सफलता मिले। फिर भी मुझे आशा है कि इससे एक-दूसरे को अधिक समझने में मदद मिलेगी और जिन विचारों का इसमें प्रतिपादन किया गया है, उनमें लोगों की रूचि बढ़ेगी। इसका एक दूसरा पहलू भी है। प्रत्येक व्यक्ति अपनी विशिष्ट पृष्ठ-भूमिका से ही चीजों का अवलोकन करता है। जो लोग न तो उन अनुभवों से होकर गुजरे हैं, जिनसे होकर मुझे गुजरना पड़ा है और न उन आदर्शों की खोज के पीछे पड़े हैं, जो मेरे आदर्श रहे हैं। सम्भव है, वे मेरी दलीलों की कदर न करें। समाजवाद या वर्ग-संघर्ष या राजनीतिक आन्दोलन अथवा संसदीय। गणतंत्र का जिन्हें नया-नया जोश है-सम्भव है, वे मेरे आशय को अभी न समझ पायें। अपने विशेष जोश में जब उन्हें कुछ रूकावटों का सामना करना पड़ेगा और उन रूकावटों का हल क्या होगा, इसकी छानबीन वे करेंगे, तो शायद जल्दी मेरी बात उनकी समझ में आये। मेरा यह संकेत हरगिज नहीं है कि मैंने सामाजिक समस्याओं का कोई सर्वथा निर्दोष हल ढूंढ लिया है या सर्वोदय ही समाज-दर्शन की इति है। मनुष्य स्वभाव से ही जिज्ञासु होता है, इसलिए वह बराबर सत्य की ओर बढ़ रहा है। वह पूर्ण सत्य तक कभी नहीं पहुंच सकता, किन्तु क्रमशः असत्य को कम करते-करते सत्य के पथ पर लग सकता है। इसमें केाई सन्देह नहीं, सर्वोदय विचार और मानव-मस्तिष्क इस प्रकार बराबर सत्य की ओर बढ़ता ही जायेगा। लेकिन मैं यह जरूर मानता हूं कि सर्वोदय आज के वर्तमान सामाजिक तत्वज्ञानों और प्रणालियों से स्पष्टतया आगे बढ़ा हुआ और उन्नत विचार है। मैं जिस प्रक्रिया से इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूं, उसे समझाने का प्रयत्न चित्र नहीं है, मेरे पास तो उस काम के लिए पर्याप्त साधन-सामग्री भी नहीं है। मैं अपनी उस विचार-सारणी के विकास का उल्लेख कर रहा हूं, जिससे प्रेरित होकर मैंने आखिरकार राजनीति को छोड़ा है।
साभार : सर्व सेवा संघ
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Permalink Reply by Rajeev Mishra "राजीव भोजपुरिया" on October 11, 2011 at 1:25pm parnam a jai bhojpuri bhaiya |
eh maha purush ke hamar koti-koti pranam a sradhanjalee ba |
enkara kabo bhula na sakat har bharayvashi enkar kaarnaama hamesa
jagmagat rahi |
bahut bahut dhanyavad ba raua ke |
jai bhojpuri
sanjay pandey
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