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Come, let's do something for Bhojpuri...

एगो गृहणी पत्नी (हाउस वाइफ मेहरारू), जवना के सगरो सपना, राहि, मंजिल, नीमन, बाउर, सम्मान, अपमान, लइका, बच्चा, वर्तमान आ भविष्य सबकुछ हम्मन से जुड़ल बा , कहीं अइसन त नइखे कि, हमनी के नौकरी, व्यवसाय, समाज, सम्बन्धी, तनाव, परेशानी, आ व्यस्तता के चलते ऊ उपेक्षित होत बा ? ........... काहें कि,
1 - हमनी के बाहरी भाग दौड़ के साथे-साथ स्थान, परिवेश, लोग बदलत रहेला जौना से मन कुण्ठित ना होखे पावेला, जबकि, गृहणी के ज्यादातर समइया एगो सीमित परिधि मे बीतेला ।
2 - हमनी के दिनचर्या में, हफ्ता में, एगो छुट्टी होला, जबकि, एगो गृहणी के सगरो दिन कार के होला । बेमारी के हालात में भी ईहे छुट्टी वाला नियम लागू होला ।
3 - हमनी के थकल हारल शरीर, घरे पहुँचला के इन्तजार में रहेला, जबकि, एगो गृहणी थकल हारल होखला के बावजूद हमनी के इन्तजार में, रहेले ।
अगर अपवाद के बात छोड़ दीहल जाओ त ई सामान्यत: हर मध्यमवर्गीय एकल परिवार के हाल बा । घर के खुशहाली आ समृद्धि जेकरा से जुड़ल बा ओकरे खातिर का रउआ कब्बो एतना सोचले बानी ? ...एगो सामान्य लउके वाला ए गम्भीर मुद्दा पे राउर विचार प्रतीक्षित बा ........

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Kudoos Anoop!

At least one Bhopuriya thinks that way. Good thought - liked it.

अनूप भैया प्रणाम आ जय भोजपुरी 

पहीले त धन्यवाद देब रौर के एह तरह के चोट चोट बात मगर बहुत ही महत्ता वाली बात बा,


भैया, एह मुद्दा पर त बहस होखे के चाही......जहाँ तक हम देखत बानी अपने समाज के त ई बहुत ही बड़ बात बा...आ बहुत ही गंभीर मुद्दा भी....काहे कि हमरे समाज मे लोग पहिला त महिला लोग से काम ना करावल चाहेला, आ दूसरा का महिला लोग के आज़ादी...अभी भी हम लोग वो बात के स्वीकार ना करत बानी जा कि महिला- पुरुष सब कहु के बराबर क हक बा.....

 

आ जहाँ तब बात बा कि पुरुष के बहरा क काम आ महिला के घर क काम, त भैया हम इहे कहब कि बस  उनकर आज़ादी के भी खियाल रखी.... बाकि त अभी कुछ कहे के लायक ना भइल बानी इह मुद्दा पर जइहा होखम तब देखल जाई....बाकी रौर भैया त जवाबे नयिखे... हमेशा के तरह से एकदम जीवन के गहराई तक जा के मुद्दा उतावेली....बहुत बहुत धन्यवाद 

 

हम सब लोगन से इहे कहब की ई बहुत ही विचारणीय मुद्दा बा ..हो सके त अपन अपन विचार देई....

 

जय भोजपुरी आ प्रणाम .

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