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कुछ भोजपुरी शब्द / समान जवन विलुप्त होखे के कगार पे बाडन स

प्रणाम आ जय भोजपुरी

जईसे की रउवा सब जानत बानी आज के आधुनिकता के समय मे लोगन के घर मे जहवा टीवी फ्रीज , मिक्सर ग्राईंडर जईसन चीज जगह ले रहल बा वोह के असर ई पडी रहल बा की जवन खाँटी भोजपुरिया समान भा जरुरत वाला चीज रहल हा उ धीरे धीरे विलुप्त हो रहल बा ।  आ ई खाली जरुरत वाला चीजन के ही ना बाल्कि औरी कई गो चीजन मे आपन असर देखा रहल बा ।

हमार एह विषय के शुरु करे के मकसद इहे बा की ओइसन  चीजन के बारे मे एक दुसरा के परिचय करावल जाउ जवना से हमनी के एह शब्दन के अपना आवे वाला पीढी के बता सकब जा आ जानकारी दे सकब जा ।

अगर केहु बतावल चीजन के चित्र भी पोस्ट करी त औरी नीमन रही । काहे की पता ना भविष्य मे एह चीजन के प्रयोग होई की ना ई चीज लउकी की ना ।


धन्यवाद आ जय भोजपुरी


Tags: कगार, कुछ, के, जवन, पे, बाडन, भोजपुरी, विलुप्त, शब्द, , More…होखे

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जांत

गाँव मे जाँत अबहियो बा लेकिन जवना हिसाब से मिक्सर ग्राईंडर हमनी के जीवन मे आ रहल बा वोह हिसाब से जांत के असतित्व खतरा मे बा ।
अब त पाकिट मे मसाला आवत बा , आटा आ औरु कुछ खातिर चक्की पे लोग जात बा जवना के असर जांत पे पडत बा आ धीरे धीरे जांत के लोग भुलाईल जा रहल बा ।


ओखर - मुसर

सब लोगन के ओखर मुसर के जानकारी होई लेकिन आज के समय मे ओहर मुसर के अस्तित्व पे खतरा आ गईल बा ।

अब आगे देखल जाउ त कुछ खास बर्तन जवना के नाव त अब कहि लेयात नईखे

काठ के बरतन - डोका , डोकी , कठवत , ढकनी , कठार

बरतन लेखा कुछ और चीज छईंटी , दउरा , दउरी , डाल , खांच , मोनिया , सुप

आ सबसे बड चीज की जब पम्पिंग सेट आ ट्युबेल के जमाना ना रहे त ढेकुल के प्रयोग होखे , इनार के जरी भा कुण्ड के जरी आ लाग जाउ आ आ ओजुगा से नारी बना के खेत मे ले पानी जाउ ।

आम के नाव - अब देखी आज के समय मे दशहरी , तोतापुरी , माल्अदह जईसन आम के नाव इयाद बा काहे की आजो मार्केट मे चलत बा लेकिन हई आम के नाव - लिटिहवा , भदईला , चोंपाहवा , खट्टहवा , बडका , पदईलवा , कजरहवा , सोन्हाईलवा , किरहवा आदि इत्यादि ...
ढेकी ...



ढेकी ,ओखर मुसर के ही काम करे वाला एगो सामान हटे
ओखर मुसर ,हाथ से चलावल जला ........
एह के लात से चलावल जला
इ धान, चाउर कूटे के काम में आवेला ....
.
बहुत धन्यवाद बा रउवा के एह विषय के शुरुवात करे खातिर .........
बृज भाई सांच पुछी त हमही ना देखले रहनी हा ।

कोटिशः धन्यवाद रउवा के आ हम दिल से एहसान मन्द बानी " ढेकी " के बारे मे जानकारी देहला खातिर ।

हम ढेकी के बारे मे पढले रहनी हा लेकिन कबो मौका ना मिलल एतना विस्तार से जाने के ।


बहुत बहुत धन्यवाद

जय भोजपुरी
अब नहीं सुनाई देती ढेकी की ढकढ़क


दुनिया भर के जीव वैज्ञानिक जिस प्रकार से डायनासोर का अंडा तलाश कर प्राचीन सभ्यता के अभ्युदय एवं बड़ी प्रजाति के विलुप्त होने का कारण ढूंढ़ रहे हैं। एक समय आएगा, जब लोग प्राचीन काल की महिलाओं के स्वस्थ रहने के राज तथा समाज में सांस्कृतिक तथा आर्थिक विकास की मेरूदंड कहलाने वाली ढेकी, जाता एवं ओखली की उपयोगिता की जानकारी हासिल करने के लिए जंगल की दौड़ लगाएंगे।
बेशक, आधुनिक मशीन का प्रभाव दौड़ती-भागती जिदंगी पर हावी हो गई है, जिस वजह से सैकड़ों साल पुराने यंत्रों को संरक्षण देने में सरकार रूचि नहीं ले रही है, लेकिन इसकी कमी के कारण दिनोंदिन सांस्कृतिक-सामाजिक एवं वैज्ञानिक मूल्यों का पतन होता जा रहा है।
परिधि संस्था के निदेशक उदय का कहना है कि वर्तमान समय में हमलोग ढेकी, जाता व ओखली को लोक विज्ञान का विषय मानते हैं, लेकिन एक दौर ऐसा भी गुजरा जब भारतीय ग्रामीण अर्थ व्यवस्था में ढेकी, जांता व ओखली को आधुनिक एवं संपन्नता की निशानी मानते थे, बल्कि महिलाएं अनाज कूटने व पीसने के बहाने धार्मिक एवं सांस्कृतिक सरोकार से जुड़ी गीतों की रचना करती थी तथा दुखती रगों का इलाज ढूंढ़ लेती थी, लेकिन आज यह हाशिए पर है।
मालूम हो कि लकड़हारा पीपल की लकड़ी को ढेकी व ओखली बनाने के लिए सबसे अधिक उपयुक्त मानते थे। वहीं बबूल व बेर की लकड़ी से समाट बनाता था, जबकि समाट में लगा लोहा समुआ कहलाता था।
विदित रहे कि इन पारंपरिक यंत्रों के इस्तेमाल के बहाने न केवल अनाज तैयार होता था, बल्कि भोर में ढेकी की ढकढ़क व जांता की घरघराहट से बच्चे भी पढ़ने के लिए उठ जाते थे। उदय का कहना है कि 'जांता' चलाने वाली गर्भवती महिलाओं को प्रसव पीड़ा एवं बच्चों को जन्म देने में परेशानी नहीं होती थी, जबकि आजकल प्राय: तीन में से दो महिलाएं आपरेशन से बच्चों का जन्म दे रही हैं।
महिलाओं एवं बच्चों के अधिकार विषय पर काम कर रहे प्रवीर का कहना है कि वर्तमान समय में लोगों के पास इतना धैर्य व समय नहीं है कि वह ढेकी, जांता व ओखली का प्रयोग कर सके। आज लोग इन यंत्रों का प्रयोग करने के लिए तैयार नहीं है। भले ही उन्हें स्वस्थ रहने के लिए पार्क में टहलना पड़े या फिर दवाओं का सेवन करना पड़े।
नतीजा यह है कि इन पारंपरिक यंत्रों का औचित्य मीना बाजार में लगे तारामाछी के समान हो गया है।


श्रोत ; जागरण .
ढूंढते रह जाओगे : ढेकी, ओखल-मूसल, जांता-चकरी


अभी कुछ वर्ष पहले टीवी पर एक साबुन कंपनी के उत्पाद का प्रचार हो रहा था कि इसके प्रयोग से 'दाग' ढूंढते रह जाओगे। कुछ इसी तर्ज पर एक-दो वर्ष बाद हमें ढेकी, ओखल-मूसल, जांता-चकरी भी ढूंढने पर नहीं मिलेंगे। मतलब साफ है कभी ग्रामीणों के लिए वरदान साबित हो चुके इन उपकरणों का उपयोग कृषि कार्य के लिए किया जाता था। ..किंतु अफसोस यह कि कम्प्यूटर व इंटरनेट युग में अब ये उपकरण विलुप्ति की कगार पर हैं। कभी घरों की शान समझे जाने वाले उपकरण अब खोजने पर नौगढ़ के जंगलों में भी विरले ही मिलेंगे। वर्तमान में आटा चक्की, मिक्सी, हालर ने इन घरेलू उपकरणों का ताज छीन लिये हैं।
जमाने की भी दाद देनी पड़ेगी। ढेकी, जांता, ओखली, मूसर, दूदहड़ी, सिकहर गांव के धनाडय लोगों के घर की दलान का शान हुआ करता था। अब यह गांव-गिरांव के चुनिन्दा गरीबों के घरों की शोभा बन कर रह गये हैं। खोजने पर सुदूर गांवों में यदा-कदा मिल जाते है। जहां जैसे भी है इसकी उपयोगिता महत्ता आज भी बनी हुई है। तीन दशक पूर्व जिस घर में ढेकी, जांता, ओखली-मूसर, दुदहड़ी, सिकहर नहीं हुआ करती थी। उनकी गांव के संभ्रान्त धनाडयों की श्रेणी में गिनती नहीं होती थी। परिवार की यह शान हुआ करती थी। यहां तक की घर के दलान में यह प्रमुख चीजें न देख वरदेखवा भी उल्टे पांव लौट जा जाते थे। समय चक्र का तकाजा ऐसा चला कि इन वस्तुओं से दलान उजाड़ खण्ड हो गये। बताते है कि ढेकी शादी, विवाह, तिलक आदि अवसरों पर अपनी उपयोगिता खास तौर से बनाये हुए थी। घर की महिलाएं एकजुटता का परिचय देते हुए गीत-सोहर के साथ धान की कुटाई किया करती थीं। धनाडय परिवारों में मजदूर महिलाएं भी इनका साथ दिया करती थीं। जांता के माध्यम से गेहूं पीसकर आटा व चना के शुद्ध बेसन तथा रहर, मटर की दालें तैयार करने में माहिर हुआ करती थीं। घर के मुखिया इन जांता के अन्न का सेवन बड़ी शान किया करते थे। ओखली-मूसल के सहारे चावल-दाल की छटाई कर बेहतर बनाने में मदद मिलती थी।
दुदहड़ी और सिकहर की तो बात ही निराली थी। पशुओं के दूध को सुबह-शाम सिल्वर, पीतल या मिट्टी के बने दुदहड़ी में रख, बोरसी के सहारे दूध को खौलाने के लिए रख दिया जाता था। इसके बाद तो घंटे दो घंटे बाद दूध की 4लाली देखते बनती थी। बिल्ली या फिर अन्य जीव-जन्तुओं से बचाव के लिए सन के सुतली से बने सिकहर पर सुरक्षित रख दिया जाता था। घर का प्रत्येक सदस्य आवश्यकतानुसार दूध-दही, घी, माठा, का सेवन नियमित रूप से करता था। अब तो दूध बाल्टा पर जाने लगा है। घर के छोटे-छोटे नवजात बच्चों को ही दूध मिल जाय मुश्किल हो गया है। बहरहाल घरों में ढेकी, ओखली-मूसल, जांता रखने के भी कई कारण हुआ करते थे। उस समय आधुनिकता की अंधी बयार नहीं चली थी। गांव-गांव में आटा चक्की इक्का-दुक्का ही मौजूद थी। धनाडय सम्पन्न परिवारों की महिलाओं में भी गजब का पुरुषार्थ हुआ करता था। तभी तो पहले जमाने की औरतें रोग मुक्त थी। उनके लिए छोटे-छोटे रोग छू मंतर हुआ करते थे। कारण चलने फिरने कार्य करने से शरीर सौष्ठव बना रहता था। आज के परिवेश की ओर नजरे इनायत करे तो संयुक्त परिवार तो गांव देहात में खोजने पर भी नहीं मिलेगा। बीवी आयी, बच्चे हुए और बंटवारा हो गया। देखा जाय तो अब सब कुछ रेडीमेड हो गया है। सारे कार्य विद्युत चालित मशीनों पर निर्भर हो चुके हैं। लब्बो-लुआब यह कि मिक्सी मशीन घर-घर की शोभा बढ़ाने लगी है। मूसल का इस्तेमाल सिर्फ शादी-विवाह में वह भी केवल दूल्हे राजा को परछने, माड़ों में रखने तक ही सिमट गया है। पाश्चात्य संस्कृति के गांव में तेजी से पैर जमाने की वजह से चट मंगनी, पट ब्याह मंदिरों, होटलों, गेस्ट हाउस, लान में होने लगे हैं। इससे मूसर का भी प्रयोग बन्द होने के कगार पर पहुंच गया है। देखा जाय तो गांव-देहात की महिलाएं भी गैस पर अपने घर की दो-चार सदस्यों का खाना पकाने के बाद टेलीविजन से चिपक जाती है। पड़ोसियों से गपशप करने में समय काट लेती हैं। चिकित्सकों का मानना है कि पहले इन उपकरणों से काम करने से खासकर महिलाएं निरोग रहती थीं। मनोचिकित्सक डा.वीपी श्रीवास्तव कहते है कि आराम तलब जिन्दगी बिल्कुल ही खतरनाक है। इससे मानसिक बीमारियों के उत्पन्न होने के आसार बढ़ जाते हैं। हड्डी रोग विशेषज्ञ डा.राजीव गुप्ता कहते है कि नियमित ढंग से काम करने से मांसपेशियां सही ढंग से कार्य करती हैं। रक्त संचार बना रहता है। महिला चिकित्सक डा.मीनाक्षी दूबे कहती है कि महिलाओं में अक्सर कमर दर्द, घुटने का दर्द आराम तलब होने के कारण हील निरन्तर बढ़ रहा है।



श्रोत ; जागरण .
गीत

जांत , ओखर मुसर जब चले त जांतसर गवात रहे आजकल नया कजरी गीत , बारहमासा गीत कहवा सुनात बा ?
दु गो औरु आम के नाव इयाद आईल ..


करवहिना आ गुलाबजल ....

बर्तन मे - तसला , तसली , डेगची
बर्तन में ..छिपनी,.....
तसला में तरेवन देवे के लोग भुला गईल बा

एगो आउर नाम बा ........
बढ़नी .........झाड़ू के बढ़नी कहल जात रहे
बहुत खुब बृज भाई ।
tarewan mane lewan, ha nu brij bhai, abahi hamara gaon me dihal jaala,
Sair
bhaiya hamni kiha sair hot rahe jaun ki karu tel wala tina ke banat rahe
okra me niche 2 go farathi (bans ke faral) banh diat rahe
okra me majboot rassi bandhal jat rahe aa okra se
gaw ke bagal ke aahar me se pani ubichh ke khet
patawal jat rahe oh me badi mehnat ke kam rahe.....

lekin aab u dekhe ke na milela........

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